हमारे देश भारत में, खासकर ग्रामीण इलाकों और गाँव-देहात में, जमीन-जायदाद को लेकर परिवार के सदस्यों के बीच विवाद होना बहुत आम बात है। अक्सर देखा जाता है कि पिता या दादा की मृत्यु के बाद उनके हिस्से की खेती की जमीन, मकान या दुकान पर सभी बच्चों का नाम तो सरकारी कागजों में दर्ज हो जाता है, लेकिन यह साफ नहीं होता कि कौन सा भाई किस कोने पर खेती करेगा या मकान के किस हिस्से में रहेगा। इसी उलझन को कानूनी रूप से सुलझाने और हर हिस्सेदार का हक अलग करने की प्रक्रिया को ‘अंश निर्धारण’ (Partition) या ‘जमीन का बंटवारा’ कहा जाता है।
अगर आपकी भी कोई ऐसी जमीन है जिसमें आपका और आपके भाइयों का नाम एक ही खाते (साझा खाता) में दर्ज है, तो आपको अंश निर्धारण के सभी नए नियमों और कोर्ट-कचहरी की प्रक्रिया को जरूर समझ लेना चाहिए। आइए इसे बहुत ही आसान शब्दों में विस्तार से समझते हैं।
अंश निर्धारण (Partition) क्या है?
अंश निर्धारण का मतलब होता है, साझा संपत्ति में से अपना कानूनी हिस्सा बिल्कुल अलग करवा लेना। जब किसी जमीन, खेत या मकान के सरकारी कागज (जैसे खतियान या जमाबंदी) में एक से ज्यादा लोगों के नाम दर्ज होते हैं, तो उसे ‘संयुक्त संपत्ति’ (Joint Property) कहा जाता है। इस स्थिति में हर हिस्सेदार का जमीन के हर एक टुकड़े पर अधिकार होता है। लेकिन जब सभी हिस्सेदार आपसी सहमति से या कानून की सहायता से अपना-अपना हिस्सा अलग कर लेते हैं, तो इसी प्रक्रिया को अंश निर्धारण या जमीन का खाता अलग करना (Partition) कहा जाता है।
ऐसी स्थिति अक्सर पैतृक संपत्ति में देखने को मिलती है, जहाँ एक ही जमीन पर कई कानूनी वारिसों का अधिकार होता है।

अंश निर्धारण (जमीन का बंटवारा) कितने प्रकार से होता है?
हमारे देश के राजस्व कानून (Revenue Law) और दीवानी कानून (Civil Law) के अनुसार, जमीन या पैतृक संपत्ति का बंटवारा मुख्य रूप से तीन तरीकों से किया जा सकता है:
1) आपसी सहमति से बंटवारा (Family Settlement)
यह जमीन के बंटवारे का सबसे अच्छा, सस्ता और शांतिपूर्ण तरीका है। इसमें परिवार के सभी हिस्सेदार (भाई, बहन, माँ) आपस में बैठकर एक जगह तय कर लेते हैं कि कौन सा हिस्सा किसे मिलेगा। इसके बाद ₹100 या ₹500 के स्टांप पेपर पर एक ‘पारिवारिक बंटवारा नामा’ (Family Settlement Deed) तैयार किया जाता है, जिस पर सभी हिस्सेदार और गाँव के दो-चार जिम्मेदार लोग गवाह के रूप में दस्तखत करते हैं। इसके बाद इसे तहसील में ले जाकर रजिस्टर करा लिया जाता है।
2) तहसीलदार/एसडीएम कोर्ट के जरिए बंटवारा (Partition through Revenue Court)
अगर जमीन खेती की है (Agriculture Land) और भाई आपस में बंटवारा करने को राजी नहीं हैं, या जमीन का नक्शा सही से नहीं बन पा रहा है, तो संबंधित राज्य के भूमि राजस्व कानून की प्रासंगिक धारा के तहत तहसीलदार, एसडीएम या सक्षम राजस्व अधिकारी के समक्ष अंश निर्धारण का आवेदन किया जा सकता है। इसके बाद सरकारी अमीन (लेखपाल/पटवारी) मौके पर जाकर जमीन को बराबर हिस्सों में नापकर सबका खाता अलग कर देता है।
3) सिविल कोर्ट के जरिए बंटवारा (Partition Suit in Civil Court)
यदि संपत्ति में खेती की जमीन के साथ-साथ रहने का मकान, दुकान, सोना-चांदी या शहर का कोई प्लॉट भी शामिल है, और परिवार के लोग आपस में लड़ने पर उतारू हैं, तो मामला दीवानी अदालत (Civil Court) में जाता है। यहाँ कोई भी एक हिस्सेदार वकील के जरिए ‘बंटवारे का मुकदमा’ (Partition Suit) ठोक सकता है। कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कानूनन सबका हिस्सा तय करके डिक्री (आदेश) जारी करता है।
अंश निर्धारण (खाता अलग करने) के लिए जरूरी शर्तें क्या हैं?
किसी भी जमीन का अंश निर्धारण कराने के लिए कानून की कुछ कड़क शर्तें हैं, जिन्हें पूरा करना अनिवार्य है:
- संपत्ति पैतृक या संयुक्त होनी चाहिए: आप केवल उसी जमीन का अंश निर्धारण करा सकते हैं जिसमें आपका पहले से कोई कानूनी हिस्सा बनता हो (जैसे बाप-दादा की जमीन)। किसी दूसरे की निजी जमीन पर आप बंटवारे का दावा नहीं ठोक सकते।
- सभी हिस्सेदारों का शामिल होना: बंटवारे की प्रक्रिया में परिवार के उन सभी लोगों का नाम और उपस्थिति जरूरी है जिनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है। अगर किसी एक हिस्सेदार (जैसे किसी बहन) को बिना बताए बंटवारा कर लिया गया, तो वह बंटवारा बाद में कोर्ट से रद्द हो जाएगा।
- नाबालिग का हिस्सा सुरक्षित रखना: अगर हिस्सेदारों में कोई छोटा बच्चा (नाबालिग) है, तो बंटवारा करते समय उसके कानूनी हक को मारना गैर-कानूनी है। उसका हिस्सा कानूनन सुरक्षित रखना ही होगा।
अंश निर्धारण कराने की पूरी कानूनी प्रक्रिया
यदि आप अपने हिस्से की संयुक्त पुश्तैनी जमीन, खेत या मकान का सरकारी खाता बिल्कुल अलग करवाना चाहते हैं, तो आपको राजस्व न्यायालय (Revenue Court) के नियमों के अनुसार इन 5 मुख्य कानूनी चरणों से गुजरना होगा:
- दस्तावेज और वंशावली (Family Tree) तैयार करना: सबसे पहले अपनी साझा जमीन के सारे सरकारी रिकॉर्ड (जैसे खतियान, वर्तमान जमाबंदी या हालिया खतौनी की नकल) निकालें। इसके साथ ही पंचायत या नगर पालिका से प्रमाणित वंशावली (वारिसान प्रमाण पत्र) बनवाएं, जिससे यह साबित हो कि आप उस दिवंगत मूल मालिक के वैध हिस्सेदार हैं।
- राजस्व न्यायालय (एसडीएम/तहसीलदार) में वाद दायर करना: एक अच्छे दीवानी या राजस्व वकील के माध्यम से आपको सक्षम राजस्व न्यायालय में ‘अंश निर्धारण का वाद पत्र’ (प्रार्थना पत्र) दाखिल करना होगा। इस वाद में जमीन का पूरा ब्योरा (खाता, खसरा नंबर, कुल रकबा) और सभी हिस्सेदारों के नाम-पते साफ-साफ लिखे होने चाहिए।
- सभी हिस्सेदारों को अदालती समन (सरकारी नोटिस): कोर्ट द्वारा वाद स्वीकार करने के बाद, संयुक्त खाते में दर्ज बाकी सभी हिस्सेदारों को सरकारी नोटिस (समन) भेजा जाता है। इसमें उन्हें एक निश्चित तारीख पर अदालत में आकर अपना पक्ष रखने या यदि कोई आपत्ति हो, तो उसे लिखित रूप में दर्ज कराने का अवसर दिया जाता है।
- सरकारी अमीन द्वारा पैमाइश और कुर्रा (Kurra) तैयार करना: सभी पक्षों को सुनने के बाद, कोर्ट के आदेश पर राजस्व टीम (लेखपाल, कानूनगो या अमीन) मौके पर जाकर जमीन की पैमाइश (नापी) करती है। जमीन को बराबर टुकड़ों में बांटकर जो अलग-अलग नक्शा बनाया जाता है, उसे कानूनी भाषा में ‘कुर्रा’ (Kurra) कहते हैं। इसी चरण में सरकारी नक्शे में जो बदलाव किया जाता है, उसे ‘तरमीम’ (Map Amendment) कहा जाता है।
- अंतिम डिक्री (Final Decree) और दाखिल-खारिज (Mutation): अमीन की रिपोर्ट और कुर्रे पर कोर्ट अपनी अंतिम मुहर (Final Decree) लगा देता है। इस आदेश की कॉपी मिलने के बाद, राजस्व रिकॉर्ड (खतौनी/जमाबंदी) में से पुराना साझा खाता बंद हो जाता है और आप सभी भाइयों के नाम से नया अलग खाता नंबर (Separate Khata) जारी कर दिया जाता है।
क्या बेटी पैतृक जमीन में अंश निर्धारण (बंटवारे) की मांग कर सकती है?
साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून (Hindu Succession Act) में किए गए बड़े बदलाव और उसके बाद 2020 के विनीत शर्मा बनाम राकेश शर्मा केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि बेटियों को भी बेटों के बराबर ही पैतृक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त है।
इसलिए, चाहे बेटी की शादी हो चुकी हो या वह कुंवारी हो, वह अपने पिता या दादा की जमीन में अपने भाइयों की तरह ही ‘अंश निर्धारण’ (बंटवारे) का केस कोर्ट में दायर कर सकती है। भाई अपनी सगी बहन को यह कहकर हिस्सेदारी देने से मना नहीं कर सकते कि “उसकी शादी हो चुकी है”।
क्या अंश निर्धारण के लिए सभी वारिसों की सहमति जरूरी है?
नहीं, अंश निर्धारण (Partition) के लिए सभी वारिसों की सहमति होना जरूरी नहीं है। यदि परिवार के कुछ सदस्य बंटवारे के पक्ष में हैं और कुछ सदस्य विरोध कर रहे हैं, तब भी कोई एक कानूनी हिस्सेदार कोर्ट या सक्षम राजस्व अधिकारी के समक्ष अंश निर्धारण की मांग कर सकता है।
हालांकि, अंतिम आदेश जारी करने से पहले सभी हिस्सेदारों को कानूनी नोटिस भेजा जाता है और उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है। यदि कोई वारिस जानबूझकर सहयोग नहीं करता या बार-बार अनुपस्थित रहता है, तो भी कानून के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
यही कारण है कि संयुक्त संपत्ति में किसी एक व्यक्ति की असहमति हमेशा अंश निर्धारण को रोक नहीं सकती। अदालत या राजस्व अधिकारी सभी पक्षों की सुनवाई के बाद कानून के अनुसार हिस्सा तय करते हैं।
अंश निर्धारण (बंटवारे का केस) करने की समय-सीमा क्या है?
कई लोगों के मन में यह शंका होती है कि पिता या दादा की मृत्यु के कितने दिनों या सालों के भीतर अंश निर्धारण का केस करना जरूरी होता है। कानूनन (Limitation Act के अनुसार), पुश्तैनी या पैतृक संपत्ति के अंश निर्धारण के लिए कोई निश्चित समय-सीमा (No Limitation Period) तय नहीं की गई है।
जब तक सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (खतौनी या जमाबंदी) में आपका नाम बाकी हिस्सेदारों के साथ एक ही संयुक्त खाते (साझा खाता) में दर्ज चला आ रहा है, तब तक आपके पास बंटवारे की मांग करने का पूरा कानूनी अधिकार सुरक्षित रहता है। चाहे संपत्ति 20 साल पुरानी हो या 50 साल पुरानी, हिस्सेदारी का विवाद उत्पन्न होने की तिथि से आप जब चाहें, तब अदालत में वाद दायर कर सकते हैं।
अंश निर्धारण (Partition) और हक-त्याग पत्र (Relinquishment Deed) में क्या अंतर है?
बहुत से लोग अंश निर्धारण (Partition) और हक-त्याग पत्र (Relinquishment Deed) को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों की कानूनी प्रकृति अलग होती है।
अंश निर्धारण का उद्देश्य संयुक्त संपत्ति को सभी कानूनी वारिसों के बीच उनके हिस्से के अनुसार अलग-अलग बांटना होता है। इसके बाद प्रत्येक वारिस का हिस्सा स्पष्ट हो जाता है और उसका अलग खाता (खतौनी/जमाबंदी) बन सकता है।
वहीं, हक-त्याग पत्र में कोई एक वारिस अपनी इच्छा से अपने हिस्से का अधिकार किसी अन्य सह-वारिस के पक्ष में छोड़ देता है। इसमें जमीन का भौतिक बंटवारा जरूरी नहीं होता, बल्कि केवल हिस्सेदारी का अधिकार हस्तांतरित होता है।
यदि परिवार के सभी सदस्यों को उनका अलग-अलग हिस्सा चाहिए, तो अंश निर्धारण उचित विकल्प होता है। लेकिन यदि कोई वारिस अपना हिस्सा छोड़ना चाहता है, तो हक-त्याग पत्र का उपयोग किया जाता है। हक-त्याग की पूरी प्रक्रिया और नियमों को विस्तार से समझने के लिए हमारा हक-त्याग पत्र (Relinquishment Deed) क्या है? लेख भी पढ़ सकते हैं।
अंश निर्धारण के लिए आवश्यक दस्तावेज
अगर आप अपनी जमीन का खाता अलग करवाने जा रहे हैं, तो इन कागजातों को पहले से संभालकर रख लें:
- जमीन का मूल खतियान, पुश्तैनी बंटवारा नामा या पुरानी रजिस्ट्री के कागजात।
- हाल के समय में निकाली गई सरकारी जमाबंदी या खतौनी की प्रमाणित नकल।
- राजस्व विभाग (तहसील) द्वारा जारी किया गया जमीन का आधिकारिक शजरा नक्शा।
- यदि मूल खातेदार (पिता या दादा) जीवित न हों, तो उनका मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate)।
- सक्षम सरकारी प्राधिकारी (जैसे ग्राम पंचायत या नगर निगम) द्वारा प्रमाणित वंशावली या परिवार रजिस्टर की नकल।
- अदालत और सरकारी दफ्तरों की कागजी कार्रवाई के लिए सभी हिस्सेदारों के वैध सरकारी पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र।
अगर कोई हिस्सेदार विदेश (NRI) में रहता हो, तो बंटवारा कैसे होगा?
यदि परिवार का कोई सदस्य नौकरी या बिजनेस के सिलसिले में गाँव से बाहर, दूसरे राज्य में या विदेश में रहता है, तो उसकी गैर-मौजूदगी में छुपकर किया गया बंटवारा कानूनन रद्द माना जाएगा। ऐसे हिस्सेदार को कोर्ट द्वारा बकायदा कानूनी समन या नोटिस भेजा जाता है। वह व्यक्ति चाहे तो खुद कोर्ट आ सकता है या अपनी जगह किसी भरोसेमंद व्यक्ति को ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ (Power of Attorney) देकर अपना अंश निर्धारण करवा सकता है।
सामान्य प्रश्न (FAQ)
क्या कोई एक हिस्सेदार अकेले अंश निर्धारण का केस दायर कर सकता है?
जी हाँ, यदि बाकी हिस्सेदार राजी नहीं हैं, तो कोई भी एक भाई अकेले ही कोर्ट में अंश निर्धारण (Partition Suit) का केस डालकर अपना हिस्सा अलग करवा सकता है।
अंश निर्धारण कराने में कितना सरकारी खर्च या कोर्ट फीस लगती है?
यदि आप तहसीलदार/एसडीएम कोर्ट से खेती की जमीन का अंश निर्धारण कराते हैं, तो इसमें कोई भारी स्टांप ड्यूटी नहीं लगती, यह बहुत ही मामूली सरकारी कोर्ट फीस (कुछ सौ रुपयों) में हो जाता है।
क्या मौखिक या ज़ुबानी तौर पर किया गया जमीन का बंटवारा कानूनन मान्य है?
नहीं, सादे कागज़ या मौखिक बंटवारे की कानून में कोई कीमत नहीं है; जब तक सरकारी रिकॉर्ड (दाखिल-खारिज) में आपका खाता अलग नहीं होता, बंटवारा अधूरा माना जाएगा।
क्या अंश निर्धारण के बाद जमीन को बेचा जा सकता है?
हाँ, एक बार जब अंश निर्धारण का आदेश आ जाता है और आपका नया खाता (खतौनी) अलग बन जाता है, तो आप अपने हिस्से की जमीन बिना किसी भाई की मर्जी के किसी को भी बेच सकते हैं।
कुर्रा (Kurra) क्या होता है?
अंश निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान सरकारी अमीन द्वारा मौके पर जाकर जो अलग-अलग हिस्सों का नक्शा तैयार किया जाता है, उसे ही कानूनी भाषा में ‘कुर्रा’ कहते हैं।
क्या अंश निर्धारण के बाद नया खाता नंबर मिलता है?
हाँ, अंश निर्धारण की प्रक्रिया पूरी होने और अंतिम आदेश जारी होने के बाद राजस्व विभाग पुराने संयुक्त खाते को विभाजित कर सकता है। इसके बाद प्रत्येक हिस्सेदार के नाम से अलग खाता, खतौनी, जमाबंदी या रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। हालांकि अलग-अलग राज्यों में रिकॉर्ड का प्रारूप और प्रक्रिया कुछ भिन्न हो सकती है।
इसी वजह से अंश निर्धारण के बाद प्रत्येक हिस्सेदार अपने हिस्से की जमीन का स्वतंत्र रूप से उपयोग, बिक्री, हस्तांतरण या ऋण संबंधी कार्य कर सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
अंश निर्धारण (Partition) संयुक्त परिवार की जमीनों को सुरक्षित करने और भविष्य के किसी भी अदालती मुकदमों से बचने का सबसे अचूक और कानूनी तरीका है। जब तक आपकी जमीन का खाता बाकी भाइयों के साथ साझा रहेगा, तब तक आप न तो उस जमीन पर कोई बैंक लोन (KCC) ले पाएंगे और न ही उसे आसानी से बेच पाएंगे।
यदि परिवार में संपत्ति के अधिकार, वसीयत, उत्तराधिकार या हिस्सेदारी को लेकर विवाद है, तो बिना वसीयत मृत्यु होने पर जमीन किसे मिलेगी, वसीयत (Will) और हक-त्याग पत्र जैसे विषयों को भी समझना उपयोगी हो सकता है।
इसलिए हमारी आपको यही सलाह होगी कि यदि परिवार में जमीन को लेकर कोई खींचतान चल रही है, तो आज ही अपनी वंशावली और खतौनी निकालकर तहसील या किसी अच्छे सिविल वकील से संपर्क करें और नियमानुसार अपना अंश निर्धारण जरूर करवा लें।

नेहा यादव एक इंजीनियर हैं, जो जमीन (Land Records) से जुड़े कागजात और सरकारी डेटा को सरल भाषा में समझाने का काम करती हैं। अपनी तकनीकी समझ की मदद से वे जटिल जानकारी को आसान बनाती हैं, ताकि हर कोई उसे आसानी से समझ सके।
Bhumi Gyan के माध्यम से उनका उद्देश्य लोगों को जमीन रिकॉर्ड, जमाबंदी, भूलेख और सरकारी भूमि प्रक्रियाओं की सही जानकारी आसान भाषा में उपलब्ध कराना है।